॥ श्री चालीदास जी ॥
जारी........
चाली कहैं जुटै तन मन से नेम टेम को ठानि सकै।
शाँति दीन बनि धीरज धरि के शब्द में सूरति सानि सकै।
राम सिया की झाँकी सन्मुख सुर मुनि को पहिचान सकै।४।
चौपाई:-
देखै नैन सुनै दोऊ काना। रसना से नहिं जात बखाना॥
जिनके भरा हृदय अज्ञाना। ते करते अपने मन माना॥
सबसे नीच बना सो जाना। वा के खुलिगे आँखी काना॥
चाली कहैं भयो मस्ताना। तन तजि निजपुर कीन पयाना।४।
पद:-
परस्वारथ परमारथ दोउ दल बिना प्रेम के होत नहीं।
चाली कहैं सत्य यह बानी सुर मुनि सब ने यही कही।
पहले नेम टेम से सुमिरौ प्रेम आय कर लिपटैगा।
चाली कहैं देव मुनि भाखा काल मृत्यु नहिं झपटैगा।
माया मृत्यु काल औ जम गण भक्त को देखि क डरते।
चाली कहैं भक्त जो सच्चे कष्ट परै नहिं टरते।६।
पद:-
बिना परिश्रम नर तन बिरथा भजन कहाँ से होवै।
चाली कहैं अन्त तन तजि कै कल्पन नर्क में रोवै।
चौरासी का चक्कर छूटै राम नाम जपि लीजै।
चाली कहैं सुलभ यह मारग मन काबू करि लीजै।४।
पद:-
नाम जपने का मजा पाये हैं हम।
दुख सुख सम मान कै आये हैं हम।
जिनकी रसना पर हर समय रट है रामै नाम की,
उनके चरणों को पकड़ि आये हैं हम।
चाली कहैं तन छोड़ि कै साकेत पुर आये हैं हम।४।
पद:-
हर जगह सब भक्त हैं और हर जगह भगवान हैं।
चाली कहैं भगवान ही ने दीन हमको ज्ञान है।
दीनता औ शान्ति बिन खुलते न आँखी कान हैं।
कर्म शुभ कीन्हे बिना हटता नहीं अज्ञान है।
पढ़ते सुनते लिखते हैं धरते नहीं कोई ध्यान हैं।
सुर मुनि की बानी मानकर जुट जाय तब कल्यान है।६।
पद:-
जपि राम नाम मन मारि गये जियतै बिधि लेख को टारि गये।१।
जम काल मृत्यु सब हारि गये चाली कहैं तरिगे तारि गये।२।
जे आलस नींद से हारि गये तिनको जमदूत पछारि गये।३।
गहि नरक कुण्ड में डारि गये चाली कहैं बिगड़ बिगाड़ गये।४।
बार्तिक:-
साधू हो या गिरही, जिसके मन में द्वैत घुसा है उसकी गती नहीं होती है। उसमें दया धर्म नहीं है। प्रेत योनि या नर्क होता है। पापी की संगति करने वाले को पापी का आधा पाप उसे मिलता है। जब शरीर छूटता है तब उसे जमदूत नर्क ले जाते हैं। नाना प्रकार के कष्ट देते हैं तब कौन सहायता करै। वहाँ तो बुद्धि भ्रष्ट है, सूझता नहीं है। मन मति से कुमति की संगति हो जाती है। यह नर तन पर उपकार और भजन के लिए मिला है। ब्राह्मण का शरीर सब से उत्तम माना गया है। ऋषी-मुनी कह गये हैं 'जो पापी से भाषन करता है उसके ऊपर पाप का असर आ जाता है। वह जब अच्छे दस मनुष्यों से भाषन कर ले तो उसका पाप नाश हो। जिसके सामने पापी निकले और वह जानता हो कि यह पापी है तो तीन बार राम-राम-राम या श्याम-श्याम-श्याम या नारायण-नारायण-नारायण कह दे तो पाप उस पर असर न करैगा। यही उपाय इसकी है। जो नहीं जानता उसे कुछ पाप न व्यापैगा।
जो बड़ा पापी है उसको जै बार देखोगे तै गऊ मारने की तुम पर हत्या लगेगी, यदि तुम जानते हो। जो नहीं जानता उसे कुछ न व्यापैगा'। ऋषी-मुनी कह गये हैं 'जहाँ पर बहुत लोग बैठे हैं उस पर दरी या कोई कपड़ा बिछा है उस पर अपना वस्त्र बिछा कर बैठो। पापी धर्मात्मा सब बैठे हैं, सब का असर तुम पर आता है। अपना वस्त्र बिछाने से तुम पर पापी का असर न आवैगा।
ऋषी मुनियों के वाक्य पर चलने से ही तुम्हारा कल्याण होगा। जिनके दया-धर्म नहीं है वे घोर पापी हैं। दूसरों को मारते काटते उन्हें अच्छा लगता है। वही मरने पर जमदूत बनाये जाते हैं। यह उपदेश हमें शंकर भगवान और हनुमान जी ने दिया था। जब तक शरीर है तब तक दया-धर्म परउपकार करता रहे। ब्यास जी ने यही बताया और सिद्ध सन्तों का भी यही मत है। कलियुग महाराज अपने परिवार नीच कौम को खूब भक्त बना रहे हैं। ऊँची कौम को नीचा दिखा रहे हैं। देखो! ऐसे ही अपने परिवार की तरक्की सब को करना चाहिए।
खान, पान और प्राण का लोभ लगा है। इससे नीचे गिर जाते हैं। कर्म की गती कर्म करने से ही मिटती है। कौन कर्म? निष्कपट होकर भगवान में लग जाय तब मिट जाय। जितने भक्त हुए हैं वे करनी करके हुए हैं। मनुष्य का अन्मोल तन बृथा में न जाय। कमर कसकर पर उपकार में लग जाय। तुम जहाँ से आये हो वहाँ कैसे पहुँचोगे बिना शुभ काम किये। पढ़ते हो, सुनते हो और लिखते हो, दूसरों को समझाते हो। वहाँ तिल तिल का हिसाब लिखा जाता है। फिर अपने मन का करते हो। जो तुम्हारे ऊपर मालिक है उससे नहीं डरते हो। मौत को भूले हो'।
चाली ने विज्ञान दशा वालों पर कहा है। उनका बाल भाव हो जाता है। उनको गंदा पानी शुद्ध पानी ऐसा मालूम होता है। सब का जूठा शुद्ध भोजन के समान है। जो कुछ खिला दो खा लेंगे। उनको हानि नहीं करेगा। तुम्हारी हानि होगी। जो देखा देखी ऐसा करते हैं उनकी गती नहीं होती। रोगी होकर मर जाते हैं। बहुत सिद्ध सन्त हैं जो आचार विचार नहीं छोड़े। कोई आश्रम में पक्षी, कुत्ता, बन्दर, साधू, गिरही मरता है तो उस दिन सब को फलाहार दिया जाता है। उनसे कोई पूछता है तो कहते हैं 'अगर हम ऐसा न करें तो यह सब ऐसे ही झूठे सिद्ध बनेंगे। अन्त में नर्क होगा। इससे ऐसा करते हैं। आप तरते औरों को तारते हैं। उनकी भी ऊँची गती है जो एक जीव को रास्ते पर लाता है। वह परम पद पाता है। उतने ही भजन से विज्ञान दशा हो जाती है, उतने ही भजन से लाखों का हिसाब बता देते हैं। ऐसी उनमें भगवान शक्ति दे देते हैं। इसमें दिमाग़ लगाना मूर्खता है। भगवान की लीला भगवान जानें। वे सर्व शक्तिमान हैं। राम कृष्ण बिष्णु के सहस्र नाम हैं। जिस नाम से प्रेम हो उसी से
मुक्ति-भक्ति, ज्ञान-विज्ञान प्राप्त हो जाता है। सिर्फ तन मन प्रेम से लग जाय।'